कैसे नववर्ष मनाऊॅ

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

खामोश क्षितिज असहाय,

खामोश हैं सभी दिशायें,

मदिरा का सिन्धु बहाऊॅ या

निर्मल जल जन को पिलाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

वसुधा यों बेहाल बनी है,

सदाचार कंगाल बनी है,

आदमी आदमखोर हो गये,

चिंता की यह बात बनी है।

दिलजले को गले लगाऊॅ या

नफरत से हाथ मिलाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

हर चौराहें मदिरा पहुॅची,

पग-पग खड़े लफंगा,

भयाक्रांत हैं हर बालाएॅ,

अस्मत का क्या खेल है नंगा!

तरस खा रही हर महिलाएॅ,

किससे दिल का दर्द सुनाएॅ?

एक ओर खंदक एक ओर खाई,

चोर-चोर मौसेरा भाई,

माॅ-बेटी यह सोच निकलती,

दामन कैसे बचाऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

पूत सपूत कपूत हुये,

पत्नी के पीछे भूत हुये।

जब दुर्दिन आते हैं,

अपने, बेगाने बन जाते हैं,

विपरीत हवा जीवन-पथ में

विकराल रूप दिखलाते हैं।

दुनिया की बदली आव-हवा

नित नई बीमारी, नई दवा,

क्या-क्या उपचार कराऊॅ?

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

नववर्ष हो सबका मंगलमय,

सब ओर विजय, सबकी हो जय।

कल्याण हो सबका ‘द्विजदेव’,

ईश्वर से यही मनाऊॅ,

कैसे नववर्ष मनाऊॅ?

मैं किसको व्यथा सुनाऊॅ?

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5 विचार “कैसे नववर्ष मनाऊॅ” पर

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